अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आनें वाले एशिया यात्रा सिर्फ़ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है; यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, व्यापार प्रबंध और रणनीतिक गठबंधनों के पुनर्संयोजन की एक निर्णायक प्रक्रिया का संकेत देती है. यह दौरा मलेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया तक फैला है. यह तीन ऐसे राष्ट्र हैं जो न सिर्फ़ एशिया की आर्थिक धुरी हैं बल्कि अमेरिका की “इंडो-पैसिफिक” नीति के केंद्रीय स्तंभ भी हैं.
हम आपको बता दें कि ट्रंप का पहला पड़ाव मलेशिया होगा, जहाँ वह आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे. 2017 के बाद यह उनका पहला प्रत्यक्ष सहभाग होगा. वह न सिर्फ़ व्यापारिक वार्ताओं में भाग लेंगे, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया की नाजुक शांति प्रक्रिया में भी किरदार निभाएंगे— विशेषकर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा टकराव के निवारण में.
यह संकेत है कि अमेरिका पुनः इस क्षेत्र में “सुरक्षा साझेदार” के रूप में अपनी किरदार को पुनर्स्थापित करना चाहता है. चीन के बढ़ते प्रभाव, विशेषकर दक्षिण चीन सागर में, ने वॉशिंगटन को यह महसूस कराया है कि यदि वह एशिया में असर बनाए रखना चाहता है, तो उसे सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक और सुरक्षा स्तर पर भी एक्टिव होना पड़ेगा.
मलेशिया के साथ ट्रंप की द्विपक्षीय वार्ता का केंद्र सेमीकंडक्टर, व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल ऊर्जा योगदान पर रहेगा. यह इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब “नवऔद्योगिक तकनीक” को अपने रणनीतिक असर का नया माध्यम बनाना चाहता है. यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रंप के आने से पहले चीन के उप-प्रधानमंत्री हे लीफेंग और अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट के बीच भी मलेशिया में वार्ता तय है जो बताती है कि इस यात्रा के पीछे आर्थिक विवाद को शांत करने का गहरा कोशिश छिपा है.
ट्रंप का दूसरा पड़ाव टोक्यो है, जहाँ ट्रंप जापान की पहली स्त्री पीएम साने ताकाइची से मिलेंगे. हम आपको बता दें कि अमेरिका-जापान संबंध परंपरागत रूप से स्थिर माने जाते हैं, पर हाल के सालों में “टैरिफ संतुलन” और “ऊर्जा नीति” को लेकर मतभेद बढ़े हैं. ट्रंप प्रशासन जापान से 550 अरब $ के निवेश की अपेक्षा कर रहा है, जिसे जापान “अवास्तविक” बता चुका है. वहीं, जापान के लिए चुनौती यह है कि अमेरिका ने अब भी ऑटोमोबाइल और इस्पात जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ऊँचे आयात शुल्क लगाए हुए हैं. इसके साथ ही अमेरिका ने जापान पर रूस से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) खरीद घटाने का भी दबाव डाला है.
यहाँ ट्रंप की रणनीति दोहरी है— एक ओर वह जापान से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़े निवेश की अपेक्षा रखते हैं, दूसरी ओर, वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जापान की ऊर्जा निर्भरता रूस पर न रहे. यह नीति सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है, क्योंकि अमेरिका चाहता है कि उसके एशियाई सहयोगी रूस और चीन दोनों से दूरी बनाए रखें.
हम आपको यह भी बता दें कि ट्रंप की यात्रा का चरम बिंदु दक्षिण कोरिया के ग्योंगजू शहर में होगा, जहाँ वह एशिया-प्रशांत आर्थिक योगदान (APEC) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बहुप्रतीक्षित मुलाकात करेंगे. यह बैठक वैश्विक दृष्टि से अत्यंत जरूरी है. अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव, दुर्लभ खनिजों (rare earths) पर निर्यात नियंत्रण और फेंटानिल (एक घातक नशीला पदार्थ) की स्मग्लिंग पर रोक जैसे मामले एजेंडा में हैं. हाल के महीनों में बीजिंग ने रणनीतिक धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिन पर अमेरिकी रक्षा उद्योग काफी हद तक निर्भर है. ट्रंप चाहते हैं कि दोनों राष्ट्रों के बीच “सब कुछ पर एक समझौता” हो जाए— यह बयान जितना महत्वाकांक्षी है, उतना ही मुश्किल भी.
सियोल के साथ भी ट्रंप एक जरूरी निवेश समझौता आखिरी रूप देने की प्रयास करेंगे. हालांकि, हाल ही में अमेरिकी एजेंसियों द्वारा जॉर्जिया स्थित एक कोरियाई फैक्ट्री पर छापे के बाद दोनों राष्ट्रों के संबंधों में तनाव आया है. फिर भी, दक्षिण कोरिया ट्रंप प्रशासन को यह दिखाना चाहता है कि वह इंडो-पैसिफिक रणनीति में एक स्थायी और भरोसेमंद भागीदार है.
दूसरी ओर, हिंदुस्तान के दृष्टिकोण से ट्रंप की एशिया यात्रा के कई आयाम हैं. सबसे पहले हिंदुस्तान भी इस दौरे में “आसियान डिजिटल सम्मेलन” के माध्यम से आभासी भागीदारी करेगा. यह इस बात का प्रतीक है कि नयी दिल्ली भले ही अमेरिका के साथ हाल के महीनों में टैरिफ विवादों से गुजरी हो लेकिन हिंदुस्तान अपने क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा नहीं कर रहा. साथ ही हिंदुस्तान के लिए ट्रंप-शी भेंट का महत्व विशेष रूप से बड़ा है. यदि अमेरिका और चीन के बीच किसी प्रकार का व्यापारिक सामंजस्य बनता है, तो इसका सीधा असर हिंदुस्तान की निर्यात नीति, तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं, और एशिया में शक्ति-संतुलन पर पड़ेगा. हिंदुस्तान के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच स्थिरता से हिंदुस्तान के “रणनीतिक स्वायत्तता” के लिए स्थान कम हो सकती है.
साथ ही, अमेरिका का दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ता हस्तक्षेप हिंदुस्तान की “एक्ट ईस्ट” नीति को भी पूरक दिशा देता है. यदि वॉशिंगटन और क्वॉड (भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका) मिलकर इंडो-पैसिफिक में नयी आर्थिक एवं तकनीकी प्रबंध गढ़ते हैं, तो हिंदुस्तान के लिए यह क्षेत्रीय एकीकरण और निवेश के नए अवसर खोलेगा.
देखा जाये तो ट्रंप की यह यात्रा सिर्फ़ एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि अमेरिकी नेतृत्व के पुनर्प्रतिष्ठान का कोशिश है. आसियान, एपीईसी, और चीन— इन तीनों मोर्चों पर अमेरिका अपनी “आर्थिक राष्ट्रवाद” की नीति को नयी विश्व-व्यवस्था के अनुकूल ढालने की प्रयास कर रहा है. हिंदुस्तान को इस प्रक्रिया में सजग रहना होगा. जहाँ एक ओर ट्रंप की व्यापारिक आक्रामकता हिंदुस्तान के निर्यात को प्रभावित कर सकती है, वहीं दूसरी ओर यह हिंदुस्तान के लिए एक अवसर भी है एशिया में संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरने का.
बहरहाल, ट्रंप की एशिया यात्रा, वैश्विक राजनीति के लिए जितनी निर्णायक है, हिंदुस्तान के लिए उतनी ही सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण. यह सिर्फ़ अमेरिका-चीन समीकरण की कहानी नहीं है, बल्कि एशिया में नए युग के शक्ति-संतुलन की किरदार भी तय करेगी